आ बैल मुझे मार

आज वह नहीं आएगी क्या? इस सोच मात्र से ही स्मिता के हाथ पैर शिथिल होने लगते हैं। धप् से सोफे पर बैठ जाती है

समोसे की अभिलाषा

एक बड़े से कड़ाही में समोसे तले जा रहे थे। उनमें से एक समोसा अपने रंग-रूप में निखार आने से बहुत खुश था। वह उबलते

लगनु की उमीद

सुरज का पढ़ना लिखना शुरू में पसंद नहीं था लगनु को। इस बस्ती में पढ़ने लिखने का चलन कभी से भी नही है। बच्चे थोड़ा बड़े

भगवान के दिन बहुरे

भगवान दुःखी थे। अतः कुछ दिनों से कामकाज में उनका मन नहीं था। और भक्तों के आवेदन की फाइलों का पहाड़ ऊँचा होता जा रहा था।

हब्बाडब्बा

मैं लिखने के टेबल के पास बैठा जरूर था, पर कविता दो पंक्ति से आगे खिसक ही नहीं रही थी। शायद ड्राइंगरूम से आती एक

सलाम इंडिया

सारा दिन एक मंदिर के बाहर बैठ भीख मांगता था मंगतू। और कभी बुदबुदा कर तो कभी मन ही मन गाली देता रहता था,‘‘ साले

किससे लड़ेगी शिवानी ?

शुगर लेवल क्या बढ़ गया, मानो आफत आ गयी। डॉक्टर के कहने पर मॉर्निंगवाक् करना पड़ रहा है शिवानी को। वरना ठंड के मौसम में नींद

तुम्हें प्यार है मुझसे

लब्जों में मेरी खूबसूरती बयाँ ना करो तुम तुम्हारी प्यार भरी नजरों में यूँ ही झलक जाता है। नजराने मेरी चाँद-सितारे तोड़ा ना करो तुम

श्रृंखल

भारी मन लिये कालेज के लिए तैयार हो रही थी स्वाति। आज सुबह अखबार की मर्मस्पर्षी खबर से मन विचलित हो उठा था। तीन लोगों

मैं बुद्धिजीवी

सुबह, चाय की चुस्कि के साथ मैंने अखबार के पहले पन्ने पर नजर दौड़ाई। उपर में ही जंगली हाथियों के झुंड की तस्वीर छपी थी।

दायबद्ध

स्कुल से निकलकर वह पिता के कर्मस्थल ‘अग्रवाल गारमेन्ट्स’ के लिए चल देती है। थोड़ी सी चिंतित और थोड़ी सी परेशान। बारहवीं परीक्षा का फार्म

मेरा समाज सेवी चिंतन

मैंनें सोचा बियालिस बसंत का आनंद तो मैं ले ही चूकी हूँ क्यों न बाँट दूँ एक बसंत उन झोपड़-पट्टियों में जहाँ बसंत आता ही

…दुःख भरे दिन

श्रृष्टि-स्थिति-विनाशक एक साथ मिल-बैठ गप्पेबाजी कर रहे थे। शिव जी ने कहा,‘ मर्त्यलोक में मनुष्य जब खुश रहता है, तब हमें याद नहीं करता! ब्रह्माजी बोले,‘

फिजाँ का रंग

पिज़्ज़ा या सैंडविच नहीं मुझे एक कटोरा बासी भात दे दो नमक-मिर्च के संग मैं भूख का स्वाद चख लूँगी इटालियन सिल्क नहीं मुझे एक तार

एक जन्म की जड़

ऊपरी तल्ले के अदब-कायदे इन दिनों मेरा प्रत्याख्यान करने लगे दीवार में टंगी प्रख्यात शिल्पी का पोट्रेट, मेरा प्रिय आर्किड या एक्वेरियम में तैरती रंग-बिरंगी मछलियाँ

मैंने युद्ध देखा है

मैंने युद्ध देखा है कत्लेआम मैंने आसमान से छिटकते बमों की विभीषिका देखी है मैंने धू-धू कर जलती आग में घर-बार-बस्तियों को राख होते देखा

आखिरकार शर्माजी भी वी.आइ.पी. बने

शर्माजी हड़बड़ाकर जा रहे थे। या यूँ कहिये, सीने में दर्द और कुछ ज्यादा ही पसीना आने की वजह से उन्हें हड़बड़ाकर ले जाया जा

मैं

तपती धूप में उनके पसीना बहाने से ही मिट्टी काँपने लगेगी घनघोर वर्षा माथे पे लिये उनके हल पकड़ने से ही फसल फलेगी दिगन्त में

मनुष्य की खोज

कयामत कैसे आयी, कैसे गुजरी, किसी को पता नहीं था। एक जगह एक मनुष्य, एक कुत्ता, एक गाय, एक कौआ और एक साँप जीवित बचे

गीता कलयुगी

(1) अस्त्र भेष बदलता है तलवार बन जाती है मिसाइल अश्वमेधी अहंकार लिये काले घोड़े पर सवार रत्नाकर सूट पहन कर बाल्मीकि बनने का ढोंग

चार चक्के की सवारी

मैं अभाव से बेहाल जी रहा था चाह थी जीवन को रर्इसी से जीने की आस थी , सपना था मेरे सपनों को चार-चाँद लगाने

आशिक

तर्ज-ए-ताजमहल एक यादगार बनाने की ख्वाहिश थी ना जुदार्इ थी ना जमीन थी ना यमुना नदी किराये के एक कमरे में चार बच्चों के संग

मेरी पूँजीवादी सोच पर एक शोध

मैंने अपने पालतू बाघ को एक पहर भूखा रखा फिर उसके पिंजरे के पास अपनी थाली ले कर खाने लगी वह गरजा, इधर-उधर झपटा लगा

भूख

दोपहर को झपकी लेने की कोमल की आदत सी है। ऐसे वक्त घर में किसी का आना उसे नागवार लगता है। आज भी विरक्ति के

विडम्बना

वह बालिका थी दलाल की दी हुर्इ साड़ी तन पे लपेटते ही किशोरी बन गयी आँगन में इधर-उधर खड़े उसके छोटे-छोटे पाँच-छ: भार्इ-बहन टुकुर-टुकुर उसे

कुत्ता काटता भी है

भले ही अपने बेटे-बहू, पोते-पोती का गुणगान ना करे, पर अपने-अपने कुत्ते का महिमागान गाते बिल्कुल भी थकते नहीं, ऐसे बहुत सारे महाशया तथा महाशयां को

भूख

आज के कवि सम्मेलन में एक नयापन था कविता पाठ से पहले हर कवि को कविता के विषय पर व्याख्यान देना था किसी ने नस्लवाद,

मैं डाक्टरेट

जिल्लत से जीने वाले हर शख्स को दूर से देख मैं उसकी किस्मत समझी दु:ख-दर्द से रोने वाले को दूर से देख मैं फितरत समझी।

मैं कारावास में

उनकी निजी अदालत के कटघरे में खड़ा मैं साक्षी-सबूत सब निरंकुश कह गए दिन-यापन की इतिकथा मैं जन्मजात मुजरिम अभिमानी हृदय में जमाट यंत्रणाएँ हाथ-पैर पसारने

मैं क्या चाहती हूँ

मैं विनाश चाहती हूँ सर्वव्यापी विस्फोरण मैं युद्ध चाहती हूँ एक और महायुद्ध! मैं चन्द्रयान नहीं मिसार्इल चाहती हूँ महाकाश का रहस्य नहीं धधकता आकाश चाहती

रविवार का हाट

बाद में संवाद देंगे यह संवाद दे कर चले जाते हैं वे लोग भद्रता के वेश में मनुष्य के मुखौटाधारी मानुष जले हुए तेल के समोसे से

हे भगवान!

आज अनेक दिन बाद एक भक्त के पीछे-पीछे मन्दिर से निकल आए थे भगवान। उन्हें उन दिनों की खुब याद आ रही थी जब उनके

जिजीविषा

थकाहारा मरियल सा एक व्यक्ति सुनसान रास्ते से अकेला ही चला जा रहा था। बेचारा जितने कदम बढ़ा नहीं रहा था उससे कहीं ज्यादा तो

बंदिशों के घेरे में

मैं नन्ही थी, प्यारी थी सबकी बड़ी दुलारी थी मुझे स्नेह मिला, ममता मिली प्यार की फुलझडि़याँ मिली मैं बढ़ती गयी और सिमटती गयी शर्म-हया

मैं धृतराष्ट्र नहीं बन सकता

बुरी संगत में पड़कर पंडित गिरधर मिश्रा का एकमात्र पुत्र सुनील बिगड़ता जा रहा था। पिता की डाँट-डपट, माँ के अति दुलार तले बेअसर होती

जय हो अन्ना

शर्माजी पूजा में बैठे थे। उनके घर के बाहर लॉन में बिछी कुर्सी पर बैठ मैं घन्टे भर से इंतजार कर रहा था। शर्माजी को आते

वो बेचारा

‘‘आॅडर!आॅडर!’’ हाकिम के हथौड़ा ठोकते ही खचाखच भरी अदालत शांत हो जाती है। कटघरे में खड़े एक सौम्य-भद्र दिखने वाले सज्जन की पलकें तेजी से

छि!

अपने घर के फस्र्ट फ्लोर के बाॅलकनी में खड़ी कुछ परेशान कुछ लज्जित सी तमाशबिनों को देख रही थी मैं। शहर के एक छोर में

बुमरेंग

लड़कों के बायोडाटाओं पर अंतिम नजर दौड़ाने के बाद गुप्ताजी ने कहा,‘‘भई, लड़के तो एक से बढ़कर एक हैं। सभी खानदानी रईस भी हैं।’’ खुश

आकाओं ने काम किया

अध्यक्ष महोदय माथा पकड़कर बैठे थे। पिछले दो दिनों से लोकसभा मानो अखाड़ा बना हुआ था। एक तरफ विपक्ष एफडीआइ के मुद्दे पर गलाफाड़कर चिल्लाते

सच

ट्रेन के इन्तजार में बैठे-बैठे झपकी आ गयी थी, श्यामलालजी को। इस झपकी के इन्तजार में बगल में बैठा व्यक्ति अपना काम तमाम कर चलता

मांस का स्वाद

नर और मादा गिद्ध तथा उनका बच्चा, तीनों ही तीन मनुष्यों की लाश पर बैठ मांस खाने में मस्त थे। अकस्मात नर गिद्ध इधर-उधर पड़े

दल बदलू

एक नवजात का भाग्य लिखने विधाता मर्त्यलोक में पधारे हुए थे। उस नवजात के राजनीतिज्ञ पिता को देख वे आश्चर्यचकित हुए। उन्हें भलीभांति याद था कि